जौनपुर जनपद (उ0प्र0) में कृषि विकास में अवस्थापनात्मक कारकों की भूमिका
रोहित चैरसिया1, महीप चैरसिया2, डाॅ0 प्रमोद कुमार तिवारी3
1छात्र, भूगोल विभाग, इलाहाबाद विश्वविद्यालय, प्रयागराज (उ0प्र0)
2शोध छात्र, भूगोल विभाग, नागरिक पी0जी0 कालेज, जंघई, जौनपुर (उ0प्र0)
3विभागाध्यक्ष, भूगोल विभाग, नागरिक पी0जी0 कालेज, जंघई, जौनपुर (उ0प्र0)
*Corresponding Author E-mail: rohitchaurasia8182@gmail.com, mahipchaurasia66@gmail.com, pktiwari61@gmail.com
ABSTRACT:
भारत में कृषि प्रतिरूप तथा कृषि उत्पादकता दोनों पर प्राविधिकी संबंधी घटकों का महत्वपूर्ण प्रभाव पाया जाता है। यह मुख्य रूप से नवीन कृषि संबंधी रणनीति के समय घटित हुआ। जिसमें शुष्क प्रदेशों में सिंचाई के लिए कृषि विज्ञान एवं प्राविधिओं के व्यापक पैमाने पर उपयोग के लिए बल दिया गया। हाल ही के वर्षों के अनुभव से पता चलता है कि भारतीय कृषि को प्रभावित करने वाले प्रमुख कारकों में सिंचाई की गहनता, कुशलता एवं सुनिश्चितता, कृषि उपकरण, शक्ति संसाधन, उच्च उत्पादकता वाले बीजों और रासायनिक उर्वरकों के उपयोग जैसे आधुनिक निवेश उल्लेखनीय हैं। यही नहीं, कृषि के प्रचालनात्मक पक्षों अथवा कृषि के स्तरों में प्रादेशिक असंतुलन के लिए उत्तरदायी हैं। अतः कृषि विकास के अवस्थापनात्मक कारकों की पहचान, वितरण एवं उपलब्धियों के विश्लेषण की आवश्यकता है। अध्ययन क्षेत्र जनपद जौनपुर में कृषि विकास के अवस्थापनात्मक कारकों के अंतर्गत सिंचाई, शक्ति आपूर्ति, परिवहन एवं विपणन, वित्तीय संस्थाएँ, कृषि विस्तार सुविधायें, कृषि उपकरणों के साथ-साथ सरकार द्वारा संचालित ग्राम्य विकास का विश्लेषण प्रस्तुत किया गया है। प्रस्तुत शोध पत्र में आँकड़ों के संग्रह हेतु द्वितीयक स्रोत से प्राप्त आँकड़ों का प्रयोग किया गया है तथा सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक तत्वों को स्पष्ट करने के लिए यथास्थान पर मानचित्र व तालिकाओं का प्रयोग किया गया है। यह शोध पत्र विश्लेषणात्मक एवं व्याख्यात्मक अनुसंधान पर आधारित है।
KEYWORDS: कृषि, विकास, अवस्थापनात्मक तत्व, संपोषणीय, विकास, भू-उपयोग।
प्रस्तावना -
कृषि विकास को प्रभावित करने वाले प्रौद्योगिकी तत्वों में आवश्यक मात्रा एवं गुणवत्ता वाले कृषि उपकरणों की उपलब्धता कृषि के तरीके, उन्नत बीज, उर्वरक, कीटनाशक तथा फसल काटने की मशीनें, ट्रैक्टर जैसे बेहतर कृषि उपकरण शामिल हैं जो भ्ूामि सुधार के उपायों की अनुपस्थिति में भी कृषि उत्पादन की वृद्धि में मदद करते हैं। इसलिए वर्तमान समय में कृषि उत्पादन को बढ़ाने हेतु आधुनिक खाद, बीज कीटनाशक दवाओं और यंत्रीकरण के साथ-साथ भूमि सुधार कार्यक्रमों को अपनाना जरूरी हो गया है। कृषि में यह कायान्तरण कैसे हुआ? एम0एस0 स्वामीनाथन के शब्दों में ‘‘यह कायान्तरण किसी चमत्कार से नहीं हुआ, बल्कि देश में कृषि प्रगति से जुड़े सभी लोगों की कड़ी मेहनत और सुनियोजित कार्य ने यह महान उपलब्धि प्रदान की है।’’ पिछले दस हजार साल के भारतीय कृषि के इतिहास एवं विगत दो दशकों के मध्य ही विज्ञान और कृषि का सही अर्थों में समन्वय हुआ और तभी से कृषि क्रान्ति का मार्ग प्रशस्त हुआ है। लेकिन देश में जनसंख्या जिस गति से बढ़ रही है उस गति से खाद्यान उत्पादन नहीं बढ़ रहा है इसका प्रमुख कारण भूमिका का सही ढंग से उपयोग न किया जाना है। जब देश में भूमि सुधार, यंत्रीकरण एवं नवाचार का समन्वित विकास किया जायेगा तो निर्माण एवं विकास प्रक्रिया का चक्र उत्पन्न होगा जिससे प्रगति, स्वावलम्बन, पूर्ण रोजगार तथा समृद्धि की धारा स्वतः स्थापित होगी। प्रस्तुत शोध पत्र में कृषि को प्रभावित करने वाले अवस्थापनात्मक तत्वों जैसे कृषि यंत्रीकरण, उर्वरक एवं उन्नत बीजों का प्रयोग, पशु संसाधन आदि का विस्तृत अध्ययन किया गया है।
अध्ययन क्षेत्र-
जौनपुर जनपद, उŸार प्रदेष का एक प्रमुख ऐतिहासिक शहर है, यह वाराणसी प्रभाग के उŸार पष्चिमी भाग में स्थित है। इसका विस्तार 24024’छ से 26012’छ अक्षांष और 8207’म् से 8305’म् देषांतर के बीच है (चित्र-1)। गोमती और सई मुख्य नदियाँ हंै मिट्टी मुख्य रूप से रेतीली, चिकनी बलुई है। जनपद में खनिजों की कमी है। जिले का भौगोलिक क्षेत्रफल 2038 वर्ग कि.मी. है। जौनपुर जिले की वास्तविक जनसंख्या 4,476,072 हैं, जिसमें 2,217,635 पुरूष तथा 2,258,437 महिला जनसंख्या है। जनसंख्या घनत्व 1113 व्यक्ति प्रतिवर्ग कि.मी. है। साक्षरता 73.66 प्रतिषत है, जिसमें 86.06 प्रतिषत पुरूष तथा 61.7 प्रतिषत महिलाएँ साक्षर है। जिले में लिंगानुपात 1024 है जोकि भारत में 1000 पुरूषों पर 940 महिलाओं की तुलना में अधिक है। 93 प्रतिषत जनसंख्या ग्रामीण क्षेत्रों में निवास करती है जिनकी आजीविका का मुख्य साधन कृषि और कृषि आधारित उद्योग है।
शोध अध्ययन का उद्देष्य:-
1- जौनपुर जनपद में अवस्थापनात्मक तत्वों की वस्तुस्थिति को स्पष्ट करना।
2- अवस्थापनात्मक तत्व और कृषि विकास के अंतर्संबंधों को स्पष्ट करना।
3- अध्ययन क्षेत्र में अवस्थापनात्मक तत्वों के विश्लेषण के आधार पर दीर्घकालिक विकास हेतु जन प्रतिक्रिया आधारित सुझावों को प्रस्तावित करना।
आँकड़ा स्रोत तथा शोध विधितंत्र-
प्रस्तुत शोध पत्र में द्वितीयक स्रोत से प्राप्त आँकड़ों का प्रयोग किया गया है तथा शोध की गुणवत्ता हेतु जनप्रतिक्रिया से संबंधित अनुभवात्मक तथ्यों के आधार पर विश्लेषण एवं व्याख्या प्रस्तुत किया गया है। सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक तथ्यों को स्पष्ट करने के लिए राष्ट्रीय सांख्यिकी पत्रिका तथा कृषि विभाग से प्राप्त आँकड़ों व मानचित्रों का प्रयोग किया गया है। यह शोध पत्र विश्लेषणात्मक एवं व्याख्यात्मक अनुसंधान पर आधारित है।
परिणाम एवं परिचर्चा-
परिमार्जित जुताई के उपकरण, थ्रेसर, ट्रैक्टर, रासायनिक एवं जैव उर्वरक तथा उच्च उत्पादकता वाले बीज कृषि के विकास के अवस्थापनात्मक कारकों के अंतर्गत आते हैं। इनमें से प्रत्येक कारक की मात्रा, गुण एवं मूल्य स्थान-स्थान पर भिन्न-भिन्न पाये जाते हैं। कृषि के विकास में आधुनिक निवेशों के महत्व को विकासशील देशों में अधिकाधिक महत्व मिलता जा रहा है। अध्ययन क्षेत्र में अवस्थापनात्मक तत्वों की स्थिति निम्न है-
बीज-
कृषि विकास में उच्च उत्पादकता वाले बीजों का विकास बहुत महत्वपूर्ण होता है। उच्च उत्पादकता वाले बीजों के प्रजनन की प्रविधियाँ प्राचीन परम्परा से नवोन्मेष की ओर क्रांतिकारी रूपांतरण है। अध्ययन क्षेत्र में गेहूँ, धान, चना, सरसों एवं आलू आदि के विशेष संदर्भ में उच्च उत्पादकता वाले बीजों का उपयोग हाल के वर्षों में तेजी से बढ़ा है। जनपद में 20 (2017-18) बीज भण्डारण केन्द्र है जहाँ पर 3480 (2017-18) मिट्रीक टन बीज रखे जा सकते हैं। इन बीज भण्डारों का वितरण और उनकी भण्डारण क्षमता तालिका-1 में दिया गया है। उच्च उत्पादकता वाले बीजों को आचार्य नरेन्द्र देव कृषि विश्वविद्यालय फैजाबाद एवं कृषि विश्वविद्यालय पंतनगर आदि शोध केन्द्रों से सरकारी एजेंसियों द्वारा क्रय करके विभिन्न कृषकों को व्यक्तिगत स्तर पर बेचा जाता है। हाल के वर्षों में क्षेत्र में व्यक्तिगत विक्रेता भी उच्च उत्पादकता वाले प्रमाणिक बीजों का फुटकर विक्रय करने लगे हैं।
रासायनिक उर्वरक-
अध्ययन क्षेत्र की जलोढ़ मिट्टियों का कृषि में उपयोग अनंत काल से होता आ रहा है। इन मिट्टियों के अत्यधिक उपयोग के परिणामस्वरूप उनके पोषक तत्वों को प्रायः समाप्त कर दिया है जिसकी क्षतिपूर्ति खादों एवं रासायनिक उर्वरकों से ही संभव है। मिट्टियों का वर्तमान समय में बिना रासायनिक उर्वरकों के उपयोग के कृषि कार्य की अब कल्पना संभव नहीं है। रासायनिक उर्वरकों के अंतर्गत सामान्य रूप से नाइट्रोजन, फास्फेट एवं पोटाष सम्मिलित है। 2014-15 में जनपद में इन रसायनिक उर्वरकों का सम्मिलित उपयोग 74033 मी0 टन तथा 2015-16 में 74920 मी0 टन व 2016-17 में 73813 मी0 टन था। विकास खण्ड स्तर पर रासायनिक उर्वरकों का उपयोग संलग्न तालिका में दिया गया है। जिसमें सर्वाधिक उपयोग शाहगंज विकास खण्ड का एवं सबसे कम सुजानगंज का है।
जैव उर्वरक-
इसके अंतर्गत हरी व कंपोस्ट खाद आते हैं जिनके उपयोग से मिट्टी की उर्वरता बनाए रखने में सहायता प्राप्त होती है। अध्ययन क्षेत्र में जैव उर्वरकों का प्रयोग निम्न है। क्षेत्र में पशुओं से प्राप्त गोबर का 20ः भाग बर्बाद हो जाता है। केवल 40ः भाग का प्रयोग खाद के रूप में होता है। सरकारी योजनाओं में जागरूकता की कमी के कारण गोबर गैस संयंत्रों का अभाव है।
कीटनाशक-
क्षेत्र में सम्पूर्ण फसल का 20-30ः कीटों, बीमारियों, खरपतवारों आदि के कारण नष्ट हो जाता है। कीटनाशकों, रोगनाशकों एवं खरपतवारों के नाशकों के महत्व को सफल कृषि उत्पादन के लिए महत्वपूर्ण स्थान होने के कारण समझा जा सकता है। जनपद में 22 कीटनाशक केन्द्र स्थापित किये गये हैं जिसमें 20 ग्राम क्षेत्र में तथा 2 नगरीय क्षेत्र में हैं। समय-समय पर सरकार द्वारा जागरूकता कार्यक्रम भी संचालित किया जाता है।
कृषि मशीन-
अध्ययन क्षेत्र में छोटे एवं सीमांत कृषक रूढि़वादी हैं और उनके कृषि संबंधी उपकरण उनको सामाजिक, आर्थिक पर्यावरण के साथ इतना घनिष्ठ रूप से सामंजस्य स्थापित किये हुए हैं कि जब तक कृषि अर्थव्यवस्था के सम्पूर्ण ताने-बाने को पूरी तरह परिमार्जित नहीं किया जाता तब तक इन छोटे सीमान्त कृषकों को परिवर्तित करना संभव नहीं है। जनपद में विकास खण्डवार कृषि यंत्र एवं उपकरणों की संख्या तालिका-प् में संलग्न है। जिसमें सर्वाधिक उन्नत थ्रेसिंग मशीन की संख्या शाहगंज विकास खण्ड में 1487 तथा सबसे कम बक्सा विकास खण्ड में 482 है। सर्वाधिक उन्नत बोवाई यंत्रों की संख्या खुटहन विकास खण्ड में 23 है तथा सबसे कम सिकरारा व धर्मापुर में 17-17 है।
आवागमन एवं परिवहन-
अध्ययन क्षेत्र में धरातलीय बनावट, अन्य भौगोलिक परिस्थितियाँ, आर्थिक संसाधनों की उपलब्धि, औद्योगिक एवं प्रावधिक स्तर के अनुसार रेल एवं सड़क परिवहन के मुख्य साधन है। जनपद में रेलवे की दो प्रकार की लाइने हैं जिसमें बड़ी रेलवे लाइन की कुल लम्बाई लगभग 250 किमी0 और छोटी रेलवे लाइन की कुल लम्बाई मात्र 60 किमी0 है। जौनपुर जनपद में सड़कों की कुल लम्बाई में सर्वाधिक राष्ट्रीय, प्रादेशिक जनपदीय एवं स्थानीय सड़कें सम्मिलित हैं। जनपद में जल परिवहन का महत्व प्राचीनकाल से ही रहा है जिसके लिए मुख्य रूप से गोमती एवं सई नदी के निचले भाग उल्लेखनीय थे, परन्तु वर्तमान समय में जल परिवहन के माध्यम से स्थानीय लकडि़यों एवं कृषि उत्पादों का नाम-मात्र का परिवहन होता है।
डाकघर एवं अन्य संचार सेवाएँ-
जनपद जौनपुर में डाक, तार एवं दूरसंचार की सुविधाएँ उपलब्ध हैं। वर्तमान समय में जनपद में कुल 421 डाकघर हैं। दूरसंचार की व्यवस्था का विस्तार तीव्र गति से हो रहा है और वर्तमान समय में 2805 टेलीफोन कनेक्शन है। मोबाइल फोन का प्रचलन अधिक बढ़ गया है जिससे इन कनेक्शनों में कमी आयी है।
विद्युतीकरण-
वर्तमान आर्थिक सामाजिक एवं सांस्कृतिक विकास के लिए सुनिश्चित एवं निरंतर विद्युत आपूर्ति एक आवश्यक अवयव है। अध्ययन क्षेत्र में विद्युत आपूर्ति की सुविधा सन् 1936 से ही उपलब्ध है परन्तु इस दिशा में तीव्र गति से विकास 1966 से प्रारंभ हुआ है। विद्युतीकरण कृषि यंत्रीकरण को गति प्रदान करने के साथ ही साथ कृष्येन्तर रोजगार के अवसरों की वृद्धि में भी सहायक होता है। ग्रामीण विद्युतीकरण कार्यक्रम हेतु सरकार निरंतर प्रयासरत है। क्षेत्र में विद्युत ग्रामों की संख्या (2015-16) में 2413 थी जो (2017-18) में 3287 हो गयी। विकास खण्ड स्तर पर बदलापुर, सिरकोनी, मडि़याहूँ में सर्वाधिक 191 विद्युत गृह ग्राम हैं।
बैंकिंग व्यवस्था-
आर्थिक विकास के लिए कुशल बैंकिंग व्यवस्था का होना एक अनिवार्य पक्ष है। बैंकों से ऋण की सुविधा के माध्यम से सीमांत कृषक भूमिहीन, ग्रामीण शिल्पकार, साधन विहीन व्यवसायी एवं अन्य निर्भर लोगों को आर्थिक सहायता देकर व्यवसायी एवं अन्य निर्भर लोगों को आर्थिक सहायता देकर कृषि, पशुपालन, कुटीर उद्योग चलाने के लिए प्रोत्साहित किया जा सकता है। जनपद में कुल बैंकों की संख्या 357 (2017-18) है जिनमें राष्ट्रीयकृत बैंकों की संख्या 213 तथा क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक शाखाओं की संख्या 110 व गैर राष्ट्रीयकृत बैंकों की संख्या 34 है। सर्वाधिक शाहगंज में 20 तथा सबसे कम खुटहन तथा रामपुर में 4-4 है।
निष्कर्ष-
जनपद में 1960 से पूर्व लघु व सीमांत कृषकों की स्थिति अत्यंत दयनीय थी। मुख्य कारण अनेक विकास खण्डों का जिला मुख्यालय से कोई सम्पर्क नहीं था। मुख्य कारण परिवहन का अभाव था क्योंकि सड़क मार्ग नहीं थे। इन क्षेत्रों में शिक्षा एवं स्वास्थ्य सुविधाओं का अत्यंत अभाव था, लेकिन द्वितीय पंचवर्षीय योजना के समाप्त होते-होते लघु एवं सीमांत कृषकों की दशा में कुछ सुधार हुआ क्योंकि नहर परियोजना के निर्माण के कारण कृषि उत्पादन में वृद्धि हुयी। शाहगंज में चीनी मिल की स्थापना हो जाने से इन विकास खण्डों में नकदी फसल (गन्ना) का उत्पादन बढ़ा। इन वर्षों में आलू संग्रह के लिय जनपद के सभी विकास खण्डों का संबंध जिला मुख्यालय से हो गया है जिससे क्षेत्र में तीव्र आर्थिक वृद्धि हुयी है। क्षेत्र में अवस्थापनात्मक तत्वों के विकास होने से व्यवसायिक कृषि (सुगंधित औषधीय पौधे, पिपरमेंट, जोजोवा आदि) के अवसर उपलब्ध हुए हैं। क्षेत्र में सरकारी योजनाओं के क्षेत्र में जागरूकता एवं सरकारी तंत्र की उदासीनता के कारण अपेक्षित लाभ नहीं मिल पा रहा है, जिससे अवस्थापनात्मक तत्वों का वास्तविक लाभ नहीं मिल पा रहा है।
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Received on 14.12.2021 Modified on 22.12.2021 Accepted on 29.12.2021 © A&V Publication all right reserved Int. J. Ad. Social Sciences. 2021; 9(4):207-212.
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